Holashtak 2025 – होलाष्टक एक विशेष काल होता है, जो होली से आठ दिन पूर्व आरंभ होता है और फाल्गुन पूर्णिमा (होलिका दहन) पर समाप्त होता है। यह काल शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, क्योंकि इस दौरान ग्रह उग्र रहते हैं और नकारात्मकता अधिक होती है।
इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि होलाष्टक 2025 में कब से कब तक रहेगा, इस दौरान कौन-कौन से कार्य करने चाहिए और कौन से नहीं, इसका धार्मिक और वैज्ञानिक आधार क्या है और इसका संपूर्ण महत्व क्या है।
होलाष्टक (Holashtak) क्या है?
होलाष्टक होली से ठीक आठ दिन पहले शुरू होने वाला एक विशेष काल होता है, जिसे हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अवधि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक होती है, जिस दिन होलिका दहन किया जाता है।
हिंदू धर्म और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, होलाष्टक का समय अशुभ माना जाता है और इस दौरान किसी भी प्रकार के शुभ कार्य करने से बचना चाहिए।
होलाष्टक (Holashtak) 2025 कब से कब तक रहेगा?
इस वर्ष होलाष्टक की शुरुआत 6 मार्च 2025 से होगी और यह 14 मार्च 2025 तक चलेगा।
घटना | तारीख (2025) |
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होलाष्टक प्रारंभ | 6 मार्च 2025 |
होलाष्टक समाप्ति (होलिका दहन) | 13 मार्च 2025 |
रंगों वाली होली (धुलंडी) | 14 मार्च 2025 |
इस अवधि के दौरान सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, यज्ञ आदि निषिद्ध होते हैं।
होलाष्टक (Holashtak) का धार्मिक महत्व
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पौराणिक कथा:
- ऐसा माना जाता है कि होलाष्टक के पहले दिन भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था।
- कामदेव ने भगवान शिव की समाधि भंग करने के लिए अपने पुष्प बाण चलाए, जिससे शिवजी का तीसरा नेत्र खुला और कामदेव जलकर भस्म हो गए।
- इस घटना के कारण इन आठ दिनों को अशुभ माना जाता है।
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होलिका और प्रह्लाद की कथा:
- भक्त प्रह्लाद के पिता, असुर राजा हिरण्यकश्यप ने उसे मारने के कई प्रयास किए।
- अंत में, उसने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का आदेश दिया।
- लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई।
- होलिका दहन इसी घटना की याद में मनाया जाता है।
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ग्रहों की उग्रता:
- इस समय में चंद्रमा, सूर्य, शनि, शुक्र, गुरु, बुध, मंगल और राहु उग्र रहते हैं।
- इसीलिए शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है।
का वैज्ञानिक आधार
- इस समय मौसम परिवर्तन होता है, जिससे मन में उदासी और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।
- ज्योतिष के अनुसार, इस दौरान अष्टमी से पूर्णिमा तक विभिन्न ग्रह उग्र रहते हैं, जिससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है।
होलाष्टक (Holashtak) में वर्जित कार्य
होलाष्टक के दौरान निम्नलिखित कार्यों को वर्जित माना गया है:
- विवाह और सगाई: विवाह एवं सगाई जैसे शुभ कार्य इस दौरान वर्जित हैं।
- गृह प्रवेश और निर्माण कार्य: इस समय नया मकान खरीदना, गृह प्रवेश करना या मकान निर्माण कार्य आरंभ करना अशुभ माना जाता है।
- नया व्यवसाय शुरू करना: व्यापार शुरू करना या किसी नई नौकरी में प्रवेश करना इस समय उचित नहीं होता।
- यज्ञ एवं हवन: मांगलिक यज्ञ और हवन करना इस दौरान टाला जाता है।
- धार्मिक संस्कार: नामकरण, मुंडन, जनेऊ आदि 16 संस्कारों में से अधिकांश संस्कार इस दौरान नहीं किए जाते।
होलाष्टक (Holashtak) में क्या करें?
होलाष्टक के दौरान कुछ कार्यों को अत्यंत शुभ माना जाता है, जो इस प्रकार हैं:
- भगवान शिव और विष्णु की पूजा: इस दौरान भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ माना जाता है।
- मंत्र जाप और स्तोत्र पाठ: हनुमान चालीसा, विष्णु सहस्रनाम, महामृत्युंजय मंत्र का जाप लाभदायक होता है।
- दान-पुण्य करना: गरीबों को भोजन कराना, वस्त्र दान करना और गौ सेवा करना पुण्यदायी होता है।
- पितरों का तर्पण: पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है।
होलाष्टक (Holashtak)के अपवाद
हालांकि होलाष्टक को उत्तर भारत में ज्यादा मान्यता प्राप्त है, लेकिन कुछ स्थानों पर इसका प्रभाव नहीं माना जाता। दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और पश्चिमी भारत में इस दौरान शुभ कार्य किए जा सकते हैं।
होलाष्टक के बाद होली का दहन और रंगों की होली
- होली का दहन (होलिका दहन) – 13 मार्च 2025 को होगा।
- रंगों वाली होली – 14 मार्च 2025 को मनाई जाएगी।
होलाष्टक (Holashtak) का प्रभाव कहां-कहां होता है?
कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उत्तर भारत में होलाष्टक का प्रभाव अधिक होता है, जबकि दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और पश्चिमी भारत में इसका अधिक प्रभाव नहीं माना जाता।
इसके अलावा, कुछ पवित्र स्थानों पर होलाष्टक का असर नहीं होता, जैसे –
✅ शत्रुंजय तीर्थ
✅ विपाशा नदी (ब्यास नदी)
✅ इरावती नदी
✅ पुष्कर सरोवर
होलाष्टक 2025 का आरंभ 6 मार्च 2025 से होगा और यह 14 मार्च 2025 तक चलेगा। इस दौरान शुभ कार्य वर्जित होते हैं, लेकिन पूजा-पाठ, दान, जप और तप करना अत्यंत लाभकारी होता है।
होलाष्टक का वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से महत्व है। यह समय मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए होता है, इसलिए इसे नकारात्मकता से दूर रहकर भक्ति और सेवा में व्यतीत करना चाहिए।
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